लेखनी / वर्तनी के भूलों पर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
लेखनी एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कौशल की एक विस्तृत श्रृंखला की आवश्यकता होती है, मजबूत शब्दावली; पाठ संरचना और आवाज की समझ; कॉग्निटिव डेवलपमेंट, अक्षरों के व्यवस्थापन का हुनर; और ऐसे कई परसेप्चुअल एबिलिटीज।
कई माता पिता बच्चों की लिखावट और उनकी वर्तनी की भूलों पर चिंतित रहते हैं। बच्चों की लेखनी को बेहतर करने के लिए सिर्फ लेखनी पर ध्यान देने की जगह उनकी दृष्टि प्रत्यक्षीकरण को जागृत करने की कोशिश करनी चाहिए। इससे उनकी लेखनी में तो अंतर आयेगा ही साथ में उनकी समझ और कॉग्निटिव डेवलपमेंट में भी सुधार होता है। लेखनी को प्रभावित करने वाले कारकों में एक है दृष्टि प्रत्यक्षीकरण।
दृष्टि प्रत्यक्षीकरण, जो हम देखते हैं उससे पहचानने, याद रखने, भेद करने और समझ बनाने की क्षमता विकसित होती है। उदाहरण के लिए, अंग्रेजी अक्षर ‘b’ को पहचानना और यह समझना कि यह ‘p’ या ‘d’ अक्षरों से भिन्न है। एक भरे डिब्बे या दराज में पेंसिल ढूंढ निकालने की क्षमता, भूलभुलैया वाली पहेली (पजल्स) पूरा करने में सक्षम होना; यह सभी दृष्टि प्रत्यक्षीकरण के अंतर्गत आते हैं।
बाधित दृष्टि प्रत्यक्षीकरण वाले बच्चों में अक्षरों को पहचानने की गति धीमी हो सकती है। संख्या और अक्षर की स्थानीय उपस्थिति और उसकी आकृति को पहचानने में भी कठिनाई हो सकती है। गेंद के खेल में गेंद पकड़ना, बैडमिंटन, कई तरह के खेलों में और खेल के मैदान में गतिविधियों की समझ में असक्षमता किसी भी बच्चे के लिए बेहद निराशाजनक हो सकती हैं। सफल लिखावट के लिए भी दृष्टि प्रत्यक्षीकरण के विकास की आवश्यकता होती है। अविकसित दृष्टि प्रत्यक्षीकरण, समग्र-विकास के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करता है।
दृष्टि प्रत्यक्षीकरण कौशल विकसित करने के लिए निम्नलिखत क्षमताओं में दक्षता बढ़ानी चाहिए:
१. स्थानिक संबंध (Spatial relations) – अंतरिक्ष में वस्तुओं के बहुआयामी संबंध, जैसे उनकी दूरी और उनकी स्थिति एक दूसरे के सापेक्ष में
२. आकार तथा पृष्ठभूमि (Figure-ground perception) – किसी वस्तु को उसकी पृष्ठभूमि से अलग करने की क्षमता।
३. आकार स्थिरता (Form constancy) – ऐसी स्थिति जिसमें कोई वस्तु या उसके गुण (जैसे आकार, रंग) में भिन्नता के बाद भी पहचान में आ पाना, जैसे किसी वस्तु का प्रकाश और कम प्रकाश दोनों ही स्थिति में पहचान में आ पाना, या किसी अक्षर की बनावट में थोड़ा परिवर्तन होने के बाद भी पहचान में आ पाना
४. दृश्य स्मृति (Visual memory) – दृश्य स्मृति अतीत में देखे गए गतिविधियों, चित्रों, स्थल, शब्द इत्यादि को याद रखने की क्षमता है
दृष्टि प्रत्यक्षीकरण को विकसित करने के लिए तीन सरल अभ्यास:
१. डबल ड्रॉइंग (Double drawing)
संसाधन:
१) चॉकबोर्ड / व्हाइटबोर्ड / दीवार पर कागज का बड़ा टुकड़ा
२) ‌चॉक / मार्कर / पेन / पेंसिल / क्रेयॉन
अभ्यास:
दोनों हाथों में मार्कर के साथ, दोनों हाथों का उपयोग करते हुए, निम्नलिखित तरीकों से एक साथ दो वृत्त बनाएं।
• दोनों हाथों को घड़ी की सूई के घूमने की दिशा में घुमाते हुए
• दोनों हाथों को घड़ी की सूई के घूमने की उल्टी दिशा में घुमाते हुए
• एक हाथ को घड़ी की सूई के घूमने की दिशा में घुमाते हुए और साथ ही दूसरे हाथ को घड़ी की सूई के घूमने की उल्टी दिशा में घुमाते हुए
अब आंखें बंद करके इन गतिविधियों को करने की कोशिश करें।
[दीवार पर कागज का बड़ा टुकड़ा लगा कर भी इस कार्य को कर सकते हैं]
२. जोड़े का खेल (Matching Puzzle Game)
संसाधन
१) मैग्जीन, न्यूज पेपर या कंप्यूटर से तस्वीरों को लेकर से एक तरह की दो कार्ड्स बनाएं
२) डेस्क
अभ्यास:
इस खेल के लिए कुछ तस्वीरें इकठ्ठी करें। हर तस्वीर जोड़ियों में हों। अब इन तस्वीरों को कार्ड्स की तरह डेस्क या फर्श पर फैला दें।
अब बच्चे से हर कार्ड के मिलान जोड़े को खोजने का प्रयास करने को कहें। अगर जोड़ियां सही मिलती हो तो एक प्वाइंट दें वरना उन्हें फेर-बदल करके वापिस बाकी के कार्ड्स में मिला दें। शुरुआत कुछ कार्ड्स के साथ करें और फिर धीरे-धीरे कार्ड्स की संख्या बढ़ाते जाएं।
३. भुलभुलैया

संसाधन
१) चॉकबोर्ड / व्हाइटबोर्ड / दीवार पर कागज का बड़ा टुकड़ा
२) ‌चॉक / मार्कर / पेन / पेंसिल / क्रेयॉन

बच्चे को दीवार पर लगे कागज के टुकड़े या व्हाइट बोर्ड के ठीक सामने खड़े हो जाने को कहें। अब मार्कर से उसपर बड़ी सी आड़ी आठ ( ∞ ) की आकृति बनाने को कहें। आकृति सोए हुए आठ जैसी दिखने चाहिए। इसे हम आलसी आठ (lazy eight) भी कहते हैं। अब इसी बनी हुई आकृति पर बारी-बारी दोनों हाथों से मार्कर चलाने को कहें। आप अलग-अलग रंगों के मार्कर भी इस्तेमाल करने को कह सकते हैं।
[मार्कर की जगह चॉक या पेन भी इस्तेमाल कर सकते हैं जो भी उपलब्ध हो]
मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों के लिए मनोविज्ञान के विशेषज्ञ से मिलना भी महत्वपूर्ण है। मनोवैज्ञानिक आपको वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कुछ ऐसे उपाय सुझाते हैं जो आपको मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों से उबरने का मौका देता है। दिए गए उपाय किसी दवाई की तरह तुरन्त काम नहीं करती बल्कि यह निरंतर अभ्यास करते रहने से सुधार करने में मदद मिलती है या फिर आपको अपनी कठिनाइयों को बेहतर तरीके से प्रबंधित करना सिखाती है।

—@#
डॉ. दीप्ति प्रिया

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