विमोह

“विमोह” अज्ञानता, भ्रम आदि के कारण उत्पन्न होने वाला वह मोह है जो मनुष्य को ‘स्व’ के शाश्वत स्वरूप से दूर कर देता है।

डॉ. दीप्ति प्रिया

कई लोगों के लिए मानसिक व भावनात्मक पीड़ा को व्यक्त करना कठिन होता है और मदद लेने में झिझक भी रहती है। हताशा, खिन्नता, उदासीनता, चिंतित रहना, नकारात्मक होना, या फिर प्रसन्नता और कभी-कभी दुखी मन का भी मुस्कराना इत्यादि मानव मन के सतह पर आसानी से दिख जाता है। पर अन्तः में उठने वाले उफ़ानों का अवलोकन करना बेहद कठिन होता है। इंटरनेट और मोबाइल के विस्तार से, जानकारियां उपलब्ध होना आसान हो गया है, पर यह समझना मुश्किल है कि कौन सी जानकारी प्रामाणिक है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे आज कल सबों को सब कुछ ही पता है, हर क्षेत्र में हर मन की अपनी राय बनी हुई है जो की किसी गहन अध्ययन पर आधारित नहीं है। एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर जब मैं व्यवहारों का निरीक्षण करने का प्रयास करती हूँ या लोगों को आत्म निरीक्षण करने के लिए मदद करती हूँ, तो सतह पर पाये जाने वाली भावनाओं के पीछे असलियत में बहुत ही गहरी पीड़ा मिलती है।

मेरे अनुभव में मनोवैज्ञानिक चुनौतियों से अवगत लोग, जो अपने आप को बेहतर करना चाहते हैं, उन्हें मैं प्रायः तीन श्रेणियों में पाती हूँ।

  • जिनके लिए दोष हमेशा दूसरों पर होता है
  • जिनके लिए दोष हमेशा स्वयं पर होता है
  • जिनके लिए संतुलन जरूरी होता है, स्वयं की गलतियों को मानना व सुधारना और दूसरों की गलतियों की जिम्मेदारी स्वयं पर न लेना (जो बहुत कम पाए जाते हैं)

मनोवैज्ञानिक उपचार की जरूरत सामान्य रूप में पहले और दूसरे श्रेणियों के लोगों को ज्यादा होती है।

समझने की बात यह है कि,

  • अगर आपकी गलती है तो सुधार भी आपको ही करना है।
  • अगर आपकी गलती नहीं है तो आप अपने ऊपर ग़लत का बोझ ले कर, या दुखी हो कर भी उसे सुधार नहीं सकते।

लेकिन चुनौती यह है कि तथाकथित बुद्धिजीवियों का भी विस्तार हो गया है। आमतौर पर ऐसी धारणा दिखती है कि हमने जो देखा, सुना या पढ़ा, वही अंतिम सत्य है। हमने जो सीख लिया वही सही है। वास्तविकता में यही परतंत्रता की निशानी है, इस बात से अनभिज्ञ की यह अपना स्वयं का विचार नहीं है। सत्य तो यह है कि, मनुष्य की प्राकृतिक प्रवृत्ति आत्म-चिंतन, आत्म-निरीक्षण और मनन के पश्चात् आने वाले तथ्यों को अलग-अलग स्तरों पर समझना है।

आत्मनिरीक्षण, मनन-चिंतन किए बिना हमें निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए। निष्कर्ष पर पहुँचने के बावजूद उसे अंतिम सत्य नहीं मान लेना चाहिए। इसके विपरीत हमें विचारशील होना चाहिए की, परिस्थिति के अनुसार और ज्ञान के अलग-अलग स्तरों पर और वास्तविकता के एक होने के बाद भी विवेचना बदल सकती है। यह समझ बहुत कम लोग ही विकसित कर पाते हैं, ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि हम विभिन्न अनुभवों और चुनौतियों के कारण ‘स्व’ के स्वरूप से विमुख हो जाते हैं, यही “स्वयं के स्वरूप का विमोह” है। अपने आचरण का संतुलित निरीक्षण कर पाने की सक्षमता को विकसित करना ही हीलिंग या थेरेपी की प्रक्रिया होती है। एक मनोवैज्ञानिक के रूप में मुझे ऐसा विश्वास है कि (और यही मेरी प्रेरणा भी है कि) साहित्य के माध्यम से कुछ लोगों को मदद कर पाऊं, अपने सकारात्मक प्रयास का विस्तार कर पाऊं। ऐसे विचारों का विस्तार कर पाऊं जो हमारे जर रूप को समझने के लिए सहायक बने और जहाँ जरूरत हो बदलने में भी। हमारे पवित्र पौराणिक ग्रंथों के रूपकों पर चर्चा से ऐसे विषय की समझ का विस्तार तर्क संगत तो है ही और रोचक भी। मेरे विचार में यही कारण है कि सैकड़ों वर्षों से इन शाश्वत ग्रंथों पर कई अलग-अलग टिप्पणियों के साथ साहित्य के कई अलग-अलग रूपों में चर्चा की गयी है। विषय और पौराणिक ग्रंथों की मर्यादा को रखते हुए मैंने भी एक ऐसा ही प्रयास पुस्तक “विमोह” के द्वारा किया है।

“विमोह” की कविताओं को मैंने कथात्मक शैली में महाभारत के कुछ प्रसंगों और पात्रों पर रचा है। काव्य-पुस्तक “विमोह” में संबंधों और जीवन-दर्शन के कुछ आयाम जिन पर व्यापक रूप से चर्चा व व्याख्या नहीं हुई है उसे विशिष्ट रूप से उजागर करने का प्रयास किया है।

डॉ. दीप्ति प्रिया

 

संक्षिप्त परिचय – डॉ. दीप्ति प्रिया

मैं डॉ. दीप्ति प्रिया, दरभंगा (बिहार) की मूल निवासी, अपनी पढाई रांची (झारखण्ड) और बेंगलुरु (कर्नाटक) में पूरी करके पिछले डेढ़ दशक से मनोविज्ञान के क्षेत्र में सतत कार्यरत हूँ। गत वर्षों में मैंने लेखिका के तौर पर भी काम करने का प्रयास किया है और अपने सक्रिय सकारात्मक प्रयास को बेहतर करते हुए लेखनी के माध्यम से सकारात्मक ऊर्जा के विस्तार की मंशा रखती हूँ।

 

 

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